खुदा ने न जाने ये क्या दुनिया बनाई हैं
इसमें किसी को खुशियों का ढेर तो
किसी को दो वक्त की रोटी भी नसीब न हो पाई हैं
देता अगर खुदा सभी को एक जैसी खुशिया
तो ये क्यों घूमती,थाली लेके रजिया
तन भी इनका हमारे जैसा ,
मन तो शायद होगा हमसे अच्छा
घूमते हैं पेट की खातिर,
कभी तो खुदा उनकी सुनेगा,,
सुनले ऐं खुदा इनकी
तू,क्यों इन्हें भटकाता हैं
दे दे इनको भी कुछ,
क्यों इन्हें सताता हैं,,,,
नही चाहिए इनको महल
न चाहिए मोटर गाड़ी
बस दे सके तो दे दे दो वक्त की रोटी
यही होगी इनकी खुशियाली
ये सब कब मिट जायेगा
जीवन शैली का फासला
हैं वो भी इन्सान,हम भी इन्सान
फिर क्यों ये दीवार बनाई हैं,,,,



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